वरिष्ठ पटकथा लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने भारतीय फिल्म सेंसर प्रणाली और दर्शकों के स्वाद पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि जो फिल्में समाज की सच्चाई दिखाती हैं, उन्हें रोक दिया जाता है, जबकि अश्लीलता और महिलाओं के प्रति असंवेदनशीलता से भरी फिल्में आसानी से पास हो जाती हैं।
‘अनंतरंग मेंटल हेल्थ कल्चरल फेस्टिवल’ के उद्घाटन सत्र में बोलते हुए अख्तर ने कहा कि खराब दर्शक ही खराब फिल्मों को सफल बनाते हैं।
“इस देश में अश्लीलता पर कोई रोक नहीं है। सेंसर बोर्ड को यह समझ नहीं कि यह गलत मूल्य हैं — यह स्त्री विरोधी दृष्टिकोण है जो महिलाओं का अपमान करता है। मगर जो फिल्म समाज का आईना दिखाएगी, उसे पास नहीं किया जाएगा,” उन्होंने कहा।
अख्तर ने कहा कि फिल्में सिर्फ समाज की हकीकत का प्रतिबिंब होती हैं।
“फिल्म समाज की एक खिड़की है, जिससे आप झांकते हैं। लेकिन खिड़की बंद करने से समाज की हालत नहीं बदलती,” उन्होंने कहा।
🔹 पुरुषवादी सिनेमा और मानसिक स्वास्थ्य
उन्होंने कहा कि अत्यधिक मर्दानगी दिखाने वाली फिल्मों की लोकप्रियता समाज की मानसिकता को दर्शाती है।
“यह पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य की वजह से है कि ऐसी फिल्में बनती हैं। अगर पुरुषों का मानसिक स्वास्थ्य सुधर जाए, तो ये फिल्में बनेंगी भी नहीं, और बनीं भी तो चलेंगी नहीं,” उन्होंने कहा।
अख्तर ने कहा,
“शो बिजनेस में दर्शक भगवान होता है — और एक खराब दर्शक ही खराब फिल्म को हिट बनाता है।”
🔹 फूहड़ गीतों पर असंतोष
अख्तर ने कहा कि उन्होंने हमेशा दोअर्थी या अश्लील गीतों से दूरी बनाई।
“80 के दशक में ऐसे गानों की भरमार थी, लेकिन मैंने कभी ऐसे गीत नहीं लिखे। दुख इस बात का नहीं कि ऐसे गाने बने, बल्कि इस बात का है कि वे सुपरहिट हुए। यह दर्शाता है कि फिल्मों को दर्शक बनाते हैं,” उन्होंने कहा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा,
“‘चोली के पीछे क्या है’ जैसे गाने पर कई माता-पिता गर्व से कहते हैं कि उनकी आठ साल की बेटी उस पर नाचती है। अगर यही समाज के मूल्य हैं, तो फिल्मों से क्या उम्मीद की जा सकती है? समाज ज़िम्मेदार है, सिनेमा केवल उसका प्रतिबिंब है।”
🔹 फिल्म ‘सैयारा’ की सराहना
अख्तर ने हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘सैयारा’ की तारीफ करते हुए कहा कि उसकी संगीत शैली में पुरानी फिल्मों जैसी आत्मीयता है।
“आज का संगीत इतना तेज़ और शोरभरा हो गया है कि आवाज़ दब जाती है। सैयारा का संगीत शांत और सुकून देने वाला है — जैसे तपती धूप में थोड़ी छाँव मिल जाए,” उन्होंने कहा।
🔹 उदासी और कला पर विचार
जब उनसे पूछा गया कि क्या उदास गाने सुनने से व्यक्ति और उदास हो जाता है, तो अख्तर ने मुस्कुराते हुए कहा —
“उदासी को नकारना सही नहीं है, वरना वह किसी और रूप में सामने आएगी। पहले फिल्मों में एक-दो दुखद गीत ज़रूर होते थे, अब नहीं हैं क्योंकि हमें लगता है ‘अच्छे दिन आ गए हैं’। यह सोच अस्वस्थ है। अगर आप दुखी हैं तो रो लीजिए, उसे स्वीकार कीजिए — यही मानसिक संतुलन बनाए रखता है।”


