केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के ताजगीपूर्ण आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से जुड़े लगभग 500 मामले फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों (FTSCs) में लंबित हैं। हालाँकि मामलों के निपटारे की गति में कुछ सुधार देखा गया है, परंतु पिछले तीन वर्षों के डेटा बताते हैं कि विशेष अदालतों में लंबित मामलों की संख्या निरंतर अधिक बनी रही है। इसका मुख्य कारण सीमित न्यायिक क्षमता और अन्य संरचनात्मक समस्याएँ मानी जा रही हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2023 के अंत तक 453 मामले लंबित थे, जो दिसंबर 2024 तक बढ़कर 509 हो गए। वहीं सितंबर 2025 तक यह संख्या 494 रही, जिससे यह स्पष्ट होता है कि निपटारे के बावजूद लंबित मामलों में केवल मामूली कमी आई है।
अधिकारियों ने बताया कि जम्मू-कश्मीर में वर्तमान में केवल चार फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें कार्यरत हैं, जिनमें दो विशेष POCSO अदालतें भी शामिल हैं। ये अदालतें बलात्कार और बाल यौन शोषण से जुड़े मामलों की सुनवाई करती हैं। इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश में 218 और मध्य प्रदेश में 67 FTSCs संचालित हो रही हैं।
भारतभर में 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 773 FTSCs, जिनमें 400 विशेष POCSO अदालतें शामिल हैं, कार्यरत हैं। न्याय का यह लंबा इंतजार महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन गया है।
आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि जम्मू-कश्मीर में नए मामलों के पंजीकरण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2023 में 76, वर्ष 2024 में 164 और 2025 के पहले नौ महीनों में 60 नए मामले दर्ज हुए हैं।
FTSCs ने 2023 में 41, 2024 में 112 और जनवरी से सितंबर 2025 के बीच 75 मामलों का निपटारा किया। हालाँकि यह संख्या लंबित मामलों को उल्लेखनीय रूप से कम करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों और विशेष POCSO अदालतों की स्थापना केंद्र प्रायोजित योजना के अंतर्गत अक्टूबर 2019 में शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य बलात्कार और POCSO अधिनियम, 2012 के तहत दर्ज मामलों का समयबद्ध और शीघ्र निपटारा सुनिश्चित करना है। योजना के तहत देशभर में 790 अदालतों की स्थापना का प्रावधान किया गया था, जो वर्तमान में 31 मार्च 2026 तक प्रभावी है।
इस योजना के लिए कुल वित्तीय परिव्यय 1,952.23 करोड़ रुपये है, जिसमें से 1,207.24 करोड़ रुपये केंद्र सरकार की ओर से निर्भया फंड से प्रदान किए जा रहे हैं।
हालांकि, विधि एवं न्याय मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि न्यायालयों के संचालन की जिम्मेदारी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की है, जबकि केंद्र केवल वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है। न्यायाधीशों, अभियोजकों और सहायक कर्मचारियों की नियुक्ति भी राज्य स्तर पर की जाती है।
विशेषज्ञों ने बताया कि देशभर में FTSCs ने अब तक 3.5 लाख से अधिक मामलों का निपटारा किया है, परंतु जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रीय राज्यों में न्यायिक अवसंरचना का विस्तार बेहद जरूरी है।
“महिलाओं और बच्चों से जुड़े संवेदनशील मामलों में समय पर न्याय सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक क्षमता को बढ़ाना अनिवार्य है,” विशेषज्ञों ने कहा।


