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Monday, March 2, 2026

यूजीसी के नए ‘इक्विटी रेगुलेशन’ पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, केंद्र और आयोग को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के हाल में अधिसूचित एक अहम विनियम पर अंतरिम रोक लगा दी। यह रोक उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान लगाई गई, जिनमें आरोप लगाया गया है कि यूजीसी ने जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को गैर-समावेशी तरीके से परिभाषित किया है और कुछ वर्गों को संस्थागत संरक्षण से बाहर कर दिया है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। विवादित विनियम — यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस) रेगुलेशंस, 2026 — को 13 जनवरी को अधिसूचित किया गया था।

इन नए नियमों के तहत देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में “इक्विटी कमेटी” गठित करना अनिवार्य किया गया है, जो भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई करेगी और समानता को बढ़ावा देगी। नियमों के अनुसार, इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), दिव्यांग व्यक्तियों और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य है।

ये नियम 2012 के यूजीसी इक्विटी विनियमों की जगह लाए गए हैं, जो मुख्य रूप से सलाहकारी प्रकृति के थे। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने नए विनियमों को इस आधार पर चुनौती दी कि इनमें “जाति-आधारित भेदभाव” को केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों तक सीमित कर दिया गया है।

याचिकाओं में कहा गया है कि इस संकीर्ण परिभाषा के चलते सामान्य या गैर-आरक्षित वर्ग के वे व्यक्ति, जो अपनी जाति पहचान के कारण उत्पीड़न या भेदभाव का सामना कर सकते हैं, संस्थागत संरक्षण और प्रभावी शिकायत निवारण से वंचित रह जाएंगे।

इस मुद्दे को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं। छात्र संगठनों और सामाजिक संगठनों ने इन नियमों को तुरंत वापस लेने की मांग करते हुए कहा है कि समानता के नाम पर लाया गया यह विनियम खुद भेदभावपूर्ण है।

सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद अब केंद्र सरकार और यूजीसी के जवाब पर आगे की सुनवाई निर्भर करेगी।

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