इसरो के चेयरमैन और अंतरिक्ष विभाग के सचिव वी. नारायणन ने मंगलवार को कहा कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू से ही जन-केंद्रित और अनुप्रयोग आधारित रहा है तथा इसे प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना के साथ विकसित किया गया है।
यूएस-इंडिया स्पेस बिजनेस फोरम के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए नारायणन ने भारत की अंतरिक्ष यात्रा के छह दशकों का जिक्र करते हुए कहा कि यह कार्यक्रम साधारण शुरुआत से आगे बढ़कर एक वैश्विक स्तर पर सम्मानित इकोसिस्टम बन चुका है, जो भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी सेवा कर रहा है।
उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में अमेरिका के शुरुआती सहयोग को याद करते हुए कहा कि देश में अंतरिक्ष गतिविधियां 1962 में शुरू हुईं और भारत द्वारा प्रक्षेपित पहला रॉकेट अमेरिका में बना था और नासा ने उपलब्ध कराया था। उन्होंने 1963 में पहले साउंडिंग रॉकेट के प्रक्षेपण और बाद के संयुक्त मिशनों — जैसे सैटेलाइट एप्लीकेशन, स्वास्थ्य अवलोकन अध्ययन और चंद्र अभियानों — का भी उल्लेख किया।
नारायणन ने कहा, “भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम किसी से मुकाबला करने के लिए नहीं, बल्कि आम आदमी के लाभ के लिए उन्नत अंतरिक्ष तकनीक लाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।” उन्होंने कहा कि समय के साथ इसका विज़न विस्तृत हुआ है और अब यह मानव-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ वैश्विक जरूरतों को भी पूरा कर रहा है।
अमेरिकी प्रतिनिधियों और उद्योग जगत के नेताओं का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि यूएस-इंडिया स्पेस बिजनेस फोरम अंतरिक्ष क्षेत्र में दोनों देशों के बढ़ते सहयोग का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि इस मंच पर अमेरिका के लगभग 14 बिजनेस पार्टनर शामिल हुए हैं और अंतरिक्ष कार्यक्रमों को अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
हालिया उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए इसरो प्रमुख ने चंद्रयान मिशनों, निसार (NISAR) सैटेलाइट और वाणिज्यिक प्रक्षेपणों को भारत-अमेरिका सहयोग की मजबूत मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि यह साझेदारी अब बराबरी और भरोसे पर आधारित है।
नारायणन ने 2020 के बाद अंतरिक्ष क्षेत्र में हुए सुधारों के चलते निजी क्षेत्र की तेज़ भागीदारी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आज मिशन के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का बड़ा हिस्सा भारतीय उद्योग तैयार कर रहा है, जिससे लागत और समय दोनों में कमी आई है। उनके अनुसार लगभग 75 प्रतिशत फंडिंग और क्रियान्वयन उद्योगों के माध्यम से हो रहा है।
भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारत 2028 तक अपने स्पेस स्टेशन का पहला मॉड्यूल लॉन्च करने और 2035 तक पूर्ण बहु-मॉड्यूल भारतीय स्पेस स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। इसके साथ ही 2040 तक मानवयुक्त चंद्र मिशन की भी योजना है।
उन्होंने बताया कि आगे चंद्रयान-4 और 5, मंगल और शुक्र मिशन, अर्थ ऑब्जर्वेशन और नेविगेशन कॉन्स्टेलेशन का विस्तार तथा गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
नारायणन ने कहा कि भविष्य के मानव चंद्र मिशनों के लिए नई पीढ़ी के हैवी-लिफ्ट प्रक्षेपण यानों की जरूरत होगी। जहां 1980 में भारत का पहला सफल लॉन्च व्हीकल केवल 35 किलोग्राम भार को लो अर्थ ऑर्बिट तक ले जा सकता था, वहीं मानव चंद्र मिशन के लिए 80–100 टन क्षमता वाले रॉकेट विकसित करने होंगे। इस दिशा में इसरो 30,000 किलोग्राम क्षमता वाले नेक्स्ट-जेनरेशन लॉन्च व्हीकल पर काम कर रहा है।
