सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उच्च न्यायालयों द्वारा महीनों तक फैसले आरक्षित रखने और उन्हें सार्वजनिक न करने की प्रवृत्ति को “पहचानी गई बीमारी” करार देते हुए कहा कि इसे समाप्त किया जाना चाहिए, ताकि समयबद्ध न्याय सुनिश्चित हो सके।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ झारखंड हाईकोर्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया था कि हाईकोर्ट ने 4 दिसंबर को एक याचिका खारिज करते हुए मौखिक रूप से फैसला सुनाया था, लेकिन अब तक उसका लिखित आदेश अपलोड नहीं किया गया है।
पीठ ने निर्देश दिया कि संबंधित अधिवक्ता को अगले सप्ताह के अंत तक पूरा फैसला उपलब्ध कराया जाए।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने फैसले में देरी को “कानून की गरिमा से खिलवाड़” बताते हुए कहा कि इससे न्यायिक दायित्वों का केवल औपचारिक पालन ही हो रहा है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका में मोटे तौर पर दो तरह के न्यायाधीश होते हैं—एक, जो फैसले आरक्षित कर समय पर सुना देते हैं, और दूसरे, जो फैसले देने में अनिश्चितकाल तक देरी करते हैं। उन्होंने कहा, “यह न्यायपालिका के सामने एक चुनौती है। यह एक पहचानी गई बीमारी है, जिसे ठीक करना और जड़ से खत्म करना जरूरी है। इसे फैलने नहीं दिया जा सकता।” उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत समस्या है।


