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बडगाम उपचुनाव: उम्मीद और मायूसी के बीच वोट डालने निकले मतदाता

मध्य कश्मीर के बडगाम में आज हुए अहम उपचुनाव में जहाँ 17 उम्मीदवारों की किस्मत EVM में बंद हुई, वहीं मतदान केंद्रों पर दिखाई दिया माहौल उम्मीद, नाराज़गी और सतर्क आशावाद का मिला-जुला रूप।

कई मतदाताओं ने बेरोज़गारी, खराब बुनियादी ढांचे और सरकारों द्वारा किए गए अधूरे वादों पर नाराज़गी जताई। स्वच्छ पेयजल की कमी, टूटी सड़कें, अनियमित बिजली और कमजोर स्वास्थ्य सेवाएँ—इन समस्याओं ने लोगों को वर्षों से परेशान कर रखा है।

ओमपोरा के मोहम्मद यूसुफ ने अपनी स्याही लगी उंगली दिखाते हुए कहा, “हमारे पास पीने का पानी नहीं, न बच्चों के लिए मैदान। आज हम उम्मीद लेकर वोट डालने आए हैं कि यूनिवर्सिटी और स्टेडियम का वादा पूरा होगा।”

बेमिना में गुस्सा और स्पष्ट दिखा। अब्दुल रहमान ने कहा, “हमने पिछले चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस को वोट दिया था, लेकिन जीत के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कोई नेता हमारे इलाके में नहीं आया। हम उपेक्षा से थक चुके हैं।”

इसके बावजूद कई मतदाता अब भी सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस पर भरोसा जता रहे हैं।

बेमिना के गुलाम हसन ने कहा, “हमारे उम्मीदवार ने पहले भी अच्छा काम किया है। NC अगले चार साल सत्ता में है—शायद इस बार विकास हमारे यहाँ भी पहुँचे।”

वहीं कुछ लोगों ने पार्टी बदलने का फैसला किया।

वहाबपोरा की एक मंझोली उम्र की महिला ने कहा, “हमने सालों तक NC को वोट दिया, लेकिन कुछ नहीं बदला। अब हम PDP को मौका देंगे—शायद सड़कें और स्वास्थ्य सुविधाएँ बेहतर हों।”

एक अन्य बूथ पर 60 वर्षीय मोहम्मद इसाक ने कहा, “पिछली बार हमने उमर अब्दुल्ला को वोट दिया, और वे गांदरबल चले गए। यहाँ कोई विकास नहीं हुआ। फिर भी मैं वोट देता हूँ—यह मेरा अधिकार है। शायद इस बार कुछ बदले।”

80 वर्षीय गुलाम मोहम्मद हाजम, बेटे के सहारे और छड़ी लेकर बूथ तक पहुँचे। उनकी बातों में दशकों का दर्द था: “मैं उम्रभर वोट डालता आया हूँ। आज भी मोमबत्ती की रोशनी में खाना खाते हैं और पानी पड़ोसियों के बोरवेल से लाते हैं। फिर भी उम्मीद है… शायद मरने से पहले असली बदलाव देख सकूँ।”

मतदान समाप्त होते ही बडगाम के मतदाता वोट डालकर लौटे—दिल में शिकायतें भी थीं और उम्मीद भी कि इस बार शायद उनकी आवाज़ सचमुच बदलाव लाए।

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